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Profile: noorfr
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  Last 10 Posts
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Sunday, July 20, 2014 7:31:24 AM
srirr wrote:
सेहरा से मेरी वापसी बेवजह तो नहीं,
तकदीर में था शहर को मसमार देखना।

कहाँ सेहरा में घूमने चले गये थे भई। और वापस आ कर क्या बरबादी देख ली जो ऐसा शेर कहा है।
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Monday, December 30, 2013 3:47:59 AM
हमें तो जान से उस पर निसार होना था
यह हादसा भी फ़क़त एक बार होना था
क़ज़ा से ख़ुद को भला हम बचायेंगे कब तक
हमें भी एक दिन उस का शिकार होना था


- फ़रहत बदायूनी
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Friday, October 18, 2013 11:53:38 AM
चोरी चोरी हमसे तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वह ठिकाना याद है ॥

- हसरत मोहानी
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Sunday, June 3, 2012 3:24:52 AM
आये भी लोग, बैठे भी, उठ भी खड़े हुये।
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफ़िल में रह गया॥

- ख़्वाजा आतिश
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Monday, April 16, 2012 5:29:14 AM
हर सांस में खिलती हुई कलियों की महक थी।
यह बात है उस दौर की जब दिल में कसक थी।
अब चाँद के हमराह निकलते नहीं वह लोग,
इस शहर की रौनक़ मेरी आवारगी तक थी॥

- नासिर काज़मी
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Wednesday, February 1, 2012 12:21:48 PM
निगाहें ढूंढती हैं
इक अजनबी से शहर में
जाने पहचाने से चेहरे
जिनके बिना
ये मेरा अपना ही शहर
अजनबी हो गया है......

- शम्स अलफ़ारुक़ी
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Friday, December 9, 2011 9:19:35 AM
फूलों के रंग से,
दिल की क़लम से,
तुझको लिखी रोज पाती
कैसे बताऊँ, किस किस तरह से,
पल पल मुझे तू सताती
तेरे ही सपने, लेकर के सोया, तेरे ही यादों में जागा
तेरे ख्यालों में उलझा रहा यूं, जैसे के माला में धागा
बादल बिजली, चन्दन पानी, जैसा अपना प्यार
लेना होगा, जनम हमें, कई कई बार

- नीरज
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Friday, December 2, 2011 5:02:19 AM
सर ज़मीन-ए हिन्द पर अक़वाम-ए आलम के फ़िराक़।
कारवाँ बस्ते गये,
हिन्दोस्ताँ बंता गया॥


फ़िराक़ गोरखपुरी
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Tuesday, November 29, 2011 11:13:13 PM
कामायनी - a poetry book always present in my reading bookshelf...

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पगतल में,
पीयूष स्रोत बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।
Topic: ये गुलिस्तान हमारा....
Posted: Saturday, November 12, 2011 9:34:54 AM
हँस देता जब प्रात, सुनहरे अंचल में बिखरा रोली,
लहरों की बिछलन पर जब मचली पड़तीं किरनें भोली,
तब कलियाँ चुपचाप उठाकर पल्लव के घूँघट सुकुमार,
छलकी पलकों से कहती हैं, कितना मादक है संसार।


my most fevourite lines ever perhaps,,, since my early childhood when i heard it for the first time,, i may not remember it correctly... but that doesn't matter,, say - तुझसे लफ़्ज़ों का नहीं रूह का रिश्ता है मेरा... तू मेरी साँसों में तहलील है ख़ुशबू की तरह.